ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते को हरी झंडी, फ्रांस समेत कई देशों में किसान सड़कों पर
यूरोपीय संघ ने मर्कोसुर समूह के साथ लंबे समय से अटके व्यापार समझौते को मंजूरी दी है। समर्थक इसे अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी मान रहे हैं, जबकि किसान और कुछ सरकारें आयात प्रतिस्पर्धा से नुकसान की आशंका जता रही हैं।
यूरोपीय संघ (EU) ने दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह मर्कोसुर के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने की दिशा में फैसला लिया है। इस करार को लेकर यूरोप में लंबे समय से बहस चल रही थी, क्योंकि इसका सीधा असर कृषि, उद्योग और व्यापार संतुलन पर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रसेल्स में राजदूतों की बैठक के बाद ईयू के 27 देशों में से अधिकांश ने समझौते के समर्थन में रुख दिखाया।

मर्कोसुर लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जिसमें अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे जैसे देश शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि अर्जेंटीना के मुताबिक समझौते पर 17 जनवरी 2026 को पराग्वे में हस्ताक्षर किए जाने की बात कही गई है। समर्थकों का तर्क है कि यह समझौता निर्यात को बढ़ावा दे सकता है, शुल्क में बचत करा सकता है और वैश्विक अनिश्चितता के दौर में साझेदारी मजबूत कर सकता है।
हालांकि, इस फैसले के साथ ही कई जगह किसानों का विरोध सामने आया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रांस और पोलैंड सहित यूरोप के अलग-अलग हिस्सों में किसान इस करार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी चिंता का मुख्य कारण यह है कि मर्कोसुर देशों से कृषि उत्पादों का आयात बढ़ने पर यूरोपीय किसानों को कीमतों और प्रतिस्पर्धा के मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में राजनीतिक खेमों के भीतर भी इस समझौते को लेकर विरोध है। इसके अलावा आयरलैंड, पोलैंड, हंगरी और ऑस्ट्रिया ने भी समर्थन नहीं दिया। फिर भी यह विरोध समझौते को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं रहा, क्योंकि कुछ देशों के रुख में बदलाव के बाद मंजूरी की दिशा मजबूत हो गई।
ईयू का दावा है कि इस समझौते से यूरोपीय कंपनियां हर साल अरबों यूरो के शुल्क बचा सकती हैं और लैटिन अमेरिकी बाजारों में वाहन, मशीनरी, वाइन और शराब जैसे उत्पादों का निर्यात आसान होगा। साथ ही, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह करार कच्चे माल की आपूर्ति और रणनीतिक निर्भरता के मुद्दों पर भी असर डाल सकता है।